Wednesday, July 11, 2012

बल

  • उपनिषदों का प्रत्येक पृष्ठ मुझे शक्ति का सन्देश देता है । यह विषय विशेष रूप से स्मरण रखने योग्य है , समस्त जीवन में मैंने यही महाशिक्षा प्राप्त की है " उपनिषद " कहतें हैं हे मानव , तेजस्वी बनो , वीर्यवान बनो , दुर्बलता को त्यागो
  • जो  हमारी जाती को शक्तिहीन कर सकती है , ऐसी दुर्बलताओं का प्रवेश हममें विगत एक हजार वर्ष से ही हुआ है । ऐसा प्रतीत होता है , मानों विगत एक हजार वर्ष से हमारे जातीय जीवन का एकमात्र लक्ष्य था की किस प्रकार हम अपने को दुर्बल से दुर्बलतर बना सकेंगें । अंत में हम वास्तव में हर एक के पैर के पास रेंगनेवाले ऐसे केंचुओं के समान हो गयें हैं की इस समय जो चाहें वही हमको कुचल सकता है ।
  •  हे बन्धुगण , तुम्हारी और मेरी नसों में एक ही रक्त का प्रवाह हो रहा है , तुम्हारा जीवन मरण मेरा भी जीवन मरण है । मैं तुमसे कहता हूँ की हमको शक्ति , केवल शक्ति ही चाहिए । उपनिषदों में ऐसी प्रचुर शक्ति विद्यमान है की वे समस्त संसार को तेजस्वी बना सकतें हैं । उनके द्वारा समस्त संसार पुनर्जीवित , सशक्त और विर्यसंपन्न हो सकता है ।

No comments:

Post a Comment