Thursday, July 12, 2012

'ब्रह्म' और 'मानव-शरीर' 'ब्रह्म' की रचना और 'मानव-शरीर' की रचना में गहरा साम्य है। यहाँ इसी तथ्य का उद्घाटन करने का प्रयत्न किया गया है। पंचतत्वों-
  1. पृथ्वी,
  2. जल,
  3. अग्नि,
  4. वायु और
  5. आकाश से 'मानव-शरीर' और 'ब्रह्म' की रचना का साम्य दर्शाया गया है।
    'द्युलोक' (आकाश) ब्रह्म का मस्तक है। यहीं आत्मा निवास करती है। 'आदित्य' (अग्नि) को ब्रह्म के नेत्र कहा गया है। 'वायु' प्राण-रूप में शरीर में स्थित है। 'जल' का स्थान उदर या मूत्राशय में है। 'पृथ्वी' ब्रह्म के चरण है। इस प्रकार 'ब्रह्म' अपने सम्पूर्ण विराट स्वरूप में इस मानव-शरीर में भी विद्यमान है। इस मर्म को समझकर ही साधक को अन्तर्मुखी होकर 'ब्रह्म' की उपासना, अपने शरीर में ही करनी चाहिए। 'ब्रह्म' इस शरीर से अलग नहीं है। यह 'आत्मा' ही ब्रह्म का अंश है।

No comments:

Post a Comment