Sunday, October 14, 2012



क्रोध

क्रोध-
क्रोध कोप गुस्सा अनख , उत्तेजना आक्रोश !
क्षोप विक्षोप रीस रुष्टि , रोद्र असूया रोष !!

भारतीय मसालों क़े निराले नुस्खों का चमत्कार

आप भी इसे भी आजमा कर देख सकते यदि गंभीर स्थिति न हो तो और लाभ उठा सकते हैं.:-

ह्रदय रोग में-गेहूं की भूसी को अर्जुन की छाल क़े साथ बराबर की मात्रा में चूर्ण बनाकर घी में भून लें
फिर इस मात्रा का तीन गुना शहद मिला कर रख लें.यह अवलेह छै ग्रामसे दस ग्रा.की मात्रा तक गाय क़े दूध में सेवन करें और भयंकर से भयंकर ह्रदय रोग को दूर भगा कर निश्चिन्त हो जाएँ

दुबलेपन में-प्रातः सायं तीन-तीन
ग्रा.हल्दी क़े चूर्ण को गोदुग्ध क़े साथ सेवन करने से शरीर मोटा हो जाता है

ताकत क़े लिये -पचास ग्रा.चने की दाल को १०० ग्रा.दूध में रात्रि को भिगो दें प्रातः काल इस फूली हुई दाल को चबा-चबा कर खाएं,उसके साथ किशमिश या गुड का प्रयोग करें.कम से कम चालीस दिन प्रयोग करने से ताकत बढ़ती है

नकसीर में-छै ग्रा.फिटकरी को ५० ग्रा.पानी में घोल कर नाक में टपकायें अथवा रुई का फाहा तः करके नाक में लगा दें.इसी पानी में कपडा तः करके माथे पर रखें,नकसीर तुरन्त बन्द हो जायेगी

नशा-नाशक -आंवले क़े पत्ते १०० ग्रा.लेकर ४०० ग्रा.पानी में ठंडाई की भांति पीस कर पिलाने से अफीम तक का विष दूर हो जाता है

निमोनिया में-अदरक अथवा तुलसी क़े पत्तों का रस ६ ग्रा.,शहद ६ ग्रा.दोनों को मिलाकर दिन में दो-तीन बार दें.इस प्रयोग से बिना किसी इंजेक्शन प्रयोग क़े खांसी,बलगम,दर्द आदि ठीक हो जाते हैं

पथरी में-पेठे क़े १०० ग्रा.रस में भवछार(जवाखार)३ ग्रा.तथा पुराना गुड २ ग्रा.मिलाकर पिलाने से कुछ ही दिन में हर प्रकार की पथरी नष्ट हो जाती है

बदहजमी में-खाने का सोडा ,सोंठ ,काली मिर्च,छोटी पीपल और नौसादर समान मात्रा में लेकर कूट-पीस कर चूर्ण बना लें.डेढ़ ग्रा.दावा दिन में तीन बार पानी से खिलाएं.बदहजमी समाप्त होगी

बाल काले करना-सूखे हुए आंवले को बारीक पीस लें,फिर नींबू का रस डालकर पीसें.इसे सिर में लगा दें.जब सूख जाये तो सिर को पानी से ढो लें.धन रखें सिर को दही से बिलकुल न धोयें.नारियल का तेल सिर में लगायें.बालों की सफेदी दूर होकर बाल काले,मुलायम और चमकदार हो जाते हैं

कुत्ता काटने पर-देसी साबुन और शहद दोनों को समान मात्रा में मिलाकर इतना रगड़ें कि,मरहम बन जाये.इसे कुत्ते क़े काटे हुए घाव पर लगायें तत्काल फायदा होगा

गंजापन दूर करें-पत्ता गोभी क़े रस को लगातार सिर पर मालिश करें तो गंजापन ,बाल ज्घरना,बाल गिरना आदि रोग दूर हो जाते हैं

सांप का विष उतारें-सांप द्वारा काटने पर एक घंटे क़े भीतर नीला थोथा (तूतिया)लें और तवे पर भून कर मुनक्का में रख कर निगलवा दें तो सांप का विष समाप्त होगा

हिचकी में-कलौंजी (मगरैला) का चूर्ण ३ ग्रा. लेकर १० ग्रा. ताज़ा मक्खन में मिलाकर खिलने से हिचकी दूर हो जाती है

मलेरिया - बुखार में-१० ग्रा. दालचीनी का चूर्ण लें उसमें ढाई ग्रा. आक का दूध मिलाकर खुश्क करें.रोगी को एक ग्रेन (आधी रत्ती )दावा पानी क़े साथ दें.यह दावा कुनैन से ज्यादा प्रभाव कारी है

दस्त में -सौंफ और सफ़ेद जीरा समान मात्रा में लें और तवे पर भून लें.फिर बारीक पीस कर ३ -३ ग्रा.दिन में दो -तीन बार तजा पानी से खिलाएं.यह सरल ,सस्ता और चमत्कारी इलाज है

उल्टी में- नींबू पर नामक और काली मिर्च लगा कर चूसने से उल्टी में लाभ होता है

राम-बाण औषद्धि:-

साफ़ सिल-बट्टा लें,जिस पर मसाला न पीसा गया हो.इस पर २५ से ५० तक तुलसी क़े पत्ते खरल कर लें ऐसे पिसे हुए पत्ते ६ से १० ग्रा. तक लें और ताजा दही अथवा शहद में मिलाकर खिलावें (दूध में भूल कर भी न दें) यह दवा प्रातः निराहार एक ही बार लें और तीन -चार मांस तक सेवन करें तो गठिया का दर्द, खांसी, सर्दी, जुकाम, गुर्दे की बीमारी, गुर्दे का काम न करना, गुर्दे की पथरी, सफ़ेद दाग का कोढ़, शरीर का मोटापा, वृद्धावस्था की दुर्बलता, पेचिश, अम्लता, मन्दाग्नी, कब्ज, गैस, दिमागी कमजोरी, याददाश्त में कमी, पुराने से पुराना सिर-दर्द, हाई एवं लो ब्लड-प्रेशर, हृदयरोग, शरीर की झुर्रियां, बिवाई और श्वास रोग दूर हो जाते हैं विटामिन , 'ए'और 'सी'की कमी दूर होती है, रुका हुआ रक्तस्त्राव ठीक हो जाता है, आँख आने और दुखने तथा खसरा निवारण में यह राम-बाण औषद्धि है उपरोक्त नुस्खे आयुर्वेदिक पद्धति क़े अनुसार हैं तथा प्रत्येक घर-परिवार में उपलब्ध अन्न व मसालों पर आधारित हैं.इनका कोई साइड-इफेक्ट या रिएक्शन नहीं होता है.आपके व आपके सम्पूर्ण परिवार क़े लिये मंगल-कामनाओं क़े साथ इन्हें प्रस्तुत किया गया है

आवश्यकता अनुसार योग्य चिकित्सक से परामर्श लेवें

बुढ़ापा

व्याघ्रीव तिष्टति जरा परितर्जयन्ती रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम् ।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम् ॥

मानव जीवन में बुढ़ापा दहाड़ती हुई बाघिन की तरह सामने आ धमकती है । विविध रोग शत्रुओं की भांति शरीर पर प्रहार करते हैं । जैसे दरार पड़े घड़े से पानी रिसता है वैसे ही आयु हाथ से खिसकती रहती है । आश्चर्य होता है इतना सब होते हुए भी लोग अहितकर कर्मों में लिप्त रहते हैं ।

पश्येम शरदः शतम्

पश्येम शरदः शतम् ।।१।।
हम सौ शरदों तक देखें, यानी सौ वर्षों तक हमारे आंखों की ज्योति स्पष्ट बनी रहे ।
जीवेम शरदः शतम् ।।२।।
सौ वर्षों तक हम जीवित रहें ।
बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।
सौ वर्षों तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे, हम ज्ञानवान् बने रहे ।
रोहेम शरदः शतम् ।।४।।
सौ वर्षों तक हम वृद्धि करते रहें, हमारी उन्नति होती रहे ।
पूषेम शरदः शतम् ।।५।।
सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें, हमें पोषण मिलता

रहे ।
भवेम शरदः शतम् ।।६।।
हम सौ वर्षों तक बने रहें ।
भूयेम शरदः शतम् ।।७।।
सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें, कुत्सित भावनाओं से मुक्त रहें ।
भूयसीः शरदः शतात् ।।८।।
सौ वर्षों से भी आगे ये सब कल्याणमय बातें होती रहें ।
(अथर्ववेद, काण्ड १९, सूक्त ६७)
ओम् तत् चक्षुः देव हितं पुरस्तात शुकं उच्चरत I
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं I
श्र्णुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतं I
अदीनः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् II
- यजु. ३६/२४

ब्रह्माण्ड तेरा रूप है , यह विश्व तेरा क्षेत्र है
इस विश्व को है देखता , सूरज तुम्हारा नेत्र है
हम भी इसे देखें प्रभु, सौ वर्ष तक देखें प्रभु
आँखों में तेरा तेज है , हर दृश्य तेरा चित्र है
सौ वर्ष तक इन कानों से हम , तेरे सुने गुण गान हम
तू ही हमारा इष्ट है , तू ही हमारा मित्र है
शत वर्ष तेरी भक्ति हो , रोगों से हरदम मुक्ति हो
तेरी शरण में है पिता , तू ही दयालु पितृ है

Wednesday, October 10, 2012

यजुर्वेद के मंत्रों की व्याख्या

वेदो में लिखी गई कुछ ऐसी बाते भी है जिसे कुछ लोगो ने जानबूझकर दबा दिया और विकृत अर्थो में लोगो के सामने रखा.
यजुर्वेद के मंत्रों को भली प्रकार जानने के लिए हमें उन मंत्रो की क्रमानुसार व्याख्या करनी होगी.

यजुर्वेद अध्याय २३ मंत्र २१.
उत्सक्थ्या अव गुदं धेहि समञ्जिं चारया वृषन् | य स्त्रीणां जीवभोजन: ||
(हे बलशाली - दुष्टो के दमनकर्ता, जो लोग अपनी स्त्रियों को क्रीड़ा एवं व्यसन में नियोजित करके अपनी जीविका प्राप्त करते हैं, आप उनको प्रताड़ित करें तथा स्त्रियों द्वारा विद्या और बुद्धि के क्षेत्र में उत्तम सुख की स्थापना करें .)
यह श्लोक स्त्री शिक्षा पर ज़ोर भी देता है तथा इसका पक्षधर भी है.

यजुर्वेद अध्याय २३ मंत्र २२.
यकासकौ शकुन्तिकाहलगिति वञ्चति | आहन्ति गभे पसो निगल्गलिती धारका ||
(आध्वर्यु का कथन - यह जो शक्ति धारण किए प्रवाहमान जल है, शकुन्ति (पक्षी) के समान अद्यातजनित शब्द करता है. इस उत्पादक जल में यज्ञ तेज आता है. तेज धारण किया हुआ जल गल-गल ध्वनि करता है.)

यजुर्वेद अध्याय २३ मंत्र २३.
यकोसकौ शकुन्तक ऽ आहलगिति वञ्चति | विवक्षत ऽ इव ते मुखमध्वर्यो मा नस्त्वमभि भाषथा: ||
(कुमारी कहती है - हे अध्वर्यु, आपका बोलने को आतुर मुख शकुन्तक पक्षी की तरह सतत शब्द कर रहा है. आप केवल यज्ञीय सन्दर्भ में अपनी वाणी का प्रयोग करें.)
यजुर्वेद अध्याय 21 मंत्र 60
सुपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिरभवदश्विभ्या छागेन सरस्वत्यै मेषेणेन्द्राय ॠषभेणाक्षस्तान मेदस्त: प्रति पचतागृभीषतावीवृधन्त पुरोडाशैरपुरश्विना सरस्वतीन्द्र: सुत्रामा सुरासोमान् ||
(यज्ञस्थल मे वनस्पतिदेव ने उपस्थित होकर छाग (औषधि) द्वारा अश्विनिकुमारो को, मेष (औषधि) द्वारा सरस्वतिदेवी को तथा ऋषभ (औषधि) द्वारा इंद्रदेव को प्रसन्न किया. संतुष्ट हुए इंद्रदेव ने अश्विनिकुमारो और देवी सरस्वती के साथ माहौषधियो का तीक्ष्णरस तथा सोम पान किया.)

अथर्ववेद के मंत्रों की व्याख्या.
अथर्ववेद कांड ४ सूक्त ४ मंत्र १
यां त्वा गन्धर्वो अखनद वरुणाय मृत भ्रजे | तां त्वा वयं खनामस्योषधिं शेपहर्षणीम् ||
(हे औषधे, वरुण (वरणिय मनुष्यों) के लिए आपको गन्धर्वो ने खोदा था. हम भी इंद्रिय-शक्ति बढ़ाने वाली औषधि आपको खोदतें हैं.)

अथर्ववेद कांड ४ सूक्त ४ मंत्र ६
अद्याग्ने अद्य सवितरद्य देवि सरस्वती | अद्यास्य ब्राह्मणस्पते धनुरिवा तानया पस: ||
(हे अग्निदेव, हे सवितादेव, हे सरस्वती, हे ब्राह्मणस्पाते. आप इस मनुष्य की इंद्रियों को बल प्रदान करके उसे धनुष के समान प्रहरक बनाएँ.)

अथर्ववेद कांड ४ सूक्त ४ मंत्र ८
अश्वस्याश्वतरस्याजस्य पेतवस्य च | अथ ऋषभस्य ये वाजास्तानस्मिन धेहि तनूवशिन ||
(हे औषधे, घोड़ा, बैल, मेढ़ा (नर-भेड़) आदि के शरीर मं जो ओजस् है, उसे मनुष्य के शरीर में स्थापित करें.)

अथर्ववेद कांड ६ सूक्त १०१ मंत्र ३
आहं तनोमि ते पासो अधि ज्यामिव धन्वनि | क्रमस्वर्श इव रोहितमनवग्लायता सदा ||
(हे पुरुष, अब हम लक्ष्य वेधन में समर्थ धनुष पर चढ़ी प्रत्यंचा के समान तुम्हारे शरीर को पुष्ट करतें हैं. तुम प्रसन्न मन ऐवं पुष्ट शरीर वाले होने के बाद. अपनी जीवानसंगिनी के सदा साथ रहो.)

अथर्ववेद कांड १४ सूक्त २ मंत्र ३८
तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या३ वपन्ति | या न ऊरु उशती विश्रयाति यसयायामुशन्त: प्रहरेंम शेप: ||
(हे पुषन् (पोषण करने वाला) आप उस कल्याणकारी उर्वारा शक्ति को प्रेरित करें. जिसमे मनुष्य बीज वपन करतें हैं. वह उल्लासित होकर अपने ऊरु (खेती योग्य भूमि) प्रदेश को विस्तरित करे. जिससे वहाँ पर बीज बोया जाए.)

अथर्वेद कांड २० सूक्त १३३ मंत्र १-४
विततौ किरणौ द्वौ तावा पिनष्टि पुरूष: | न वै कुमारी तत तथा यथा कुमारी मन्यसे ||
मातुष्टे किरणौ द्वौ निवृत: पुरुषा नृते | न वै कुमारी तत तथा यथा कुमारी मन्यसे ||
निगृह्य कर्णकौ द्वौ निरा यच्छसि मध्यमे | न वै कुमारी तत तथा यथा कुमारी मन्सये ||
उत्तनायै शयानायै तिष्ठन्ती वाव गुहसि | न वै कुमारी तत तथा यथा कुमारी मन्सये ||
(इन सभी मंत्रो को प्रवहलिका पहेलियाँ कहा जाता है. जो मनुष्य की बुद्धि (कुमारी) और माया (किरणौ) का परस्पर धन(वित) और ममता(मातुष्टे) के साथ संबंध व्यक्त करती हैं (१-२). हे मध्‍यमे, आप जड़ और चेतन दोनो कर्णो (छोरो) को नियोजित कर देतीं हैं, ऐसा भी नही हैं (३). ये पूरी प्रकृति सोते जागते माया के अधीन ही रहती हैं. ऐसा भी नही हैं (४).)

मनुष्यों की समानता से संबंधित.
सह्रदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि व: |
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जात्मिवाघ्न्या ||
(हे मनुष्यों ! हम आपके लिए हृदय को प्रेमपूर्ण बनाने वाले तथा सौमनस्य बढाने वाले कर्म करते हैं. आप लोग परस्पर उसी प्रकार व्यवहार करें, जिस प्रकार गौ अपने बछड़े से स्नेह करती है.)

अनुव्रत: पितु: पुत्रो मात्रा भवतु संमना: |
जाया पत्ये मधुमति वाचं वदतु शन्तिवाम ||
(पुत्र अपने पिता के अनुकूल कर्म करने वाला हो और पता के साथ सामान विचार से रहने वाला हो. पत्नी अपने पति से मधुरता तथा सुख से युक्त वाणी बोले.)

येन देवा न वियन्ति नो च विद्विष्ते मिथ: |
तत कृन्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञान पुरुषेभ्य: ||
(जिसकी शक्ति से देवगण भी विपरीत विचार वाले नहीं होते और आपस में द्वेष नहीं करते है. उस सामान विचार को सम्पादित करने वाले ज्ञान को हम आपके घर के मनुष्यों के लिए प्रयुक्त करते हैं.)


स्त्री या नारी शक्ति से संबंधित.
नास्य जाया शतवाही कल्याणी तल्पमा शये |
यस्मिन राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ||
(जिस राष्ट्र में इस ब्रह्मजाया (पवित्र नारी) को जड़ता पूर्वक प्रतिबन्ध में डाला जाता है, उस राष्ट्र में सैकड़ों कल्यानो को धारण करने वाली 'जाया' (विद्या) भी फलित होने से वंचित रह जाती है.)


अथर्ववेद के सन्दर्भ में ये बात भी जान लेनी चाहिए की वेदों में सिर्फ़ यज्ञीय कर्मकांडों पर ही नही अपितु मनुष्य के क्रियाकलापों, प्रकृति की क्रियाओं, अध्यात्म, अनुशासन आदि पर भी लिखा गया है.

आज हम अधिकतर की सोच यही है की भौतिक विकास के लिए हम को चालबाज, तिकड़मी, बेईमान, धोखेबाज होना चाहिए। क्योंकि चालबाज, तिकड़मी, बेईमान, धोखेबाज, कुटिल, कपटी, छली, प्रपंची व्यक्ति को व्यावहारिक चालाक, पटु माना जाता है।
छल और कपट को तात्कालिक स्वार्थसिद्धि के कौशल के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसका दुष्परिणाम है कि जीवन में परस्पर अविश्वास, अपवित्रता एवं कुटिलता बढ़ती जा रही है। भोगवादी विचारधारा इन्द
्रियों की तृप्ति में ही सुख मानती है इस कारण कपटता को सुखी जीवन का आधार मान लिया जाता है। अहंकार मन के कपट को बढ़ा देता है। कपट के कारण व्यक्ति खुल नहीं पाता,ऐसी स्थिति में मानसिक बेचैनी, अकारण चिन्ता, भय, कल्पित शारीरिक रोग आदि उत्पन्न हो जाते हैं।
अतः जीवन सुखमय करने के लिए सरलता, निष्कपटता, स्पष्टवादिता तथा ईमानदारी का होना अत्यंत जरूरी है।
हमारे शिवपुराण में कहा गया है कि दयालु मनुष्य, अभिमानशून्य व्यक्ति, परोपकारी और जितेंद्रीय ये चार पवित्र स्तंभ हैं, जो इस पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, भ्राता एवं आदर्श राजा- एक वचन, एक पत्नी, एक बाण जैसे व्रतों का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले राम का चरित्र उकेरकर अहिंसा, दया, अध्ययन, सुस्वभाव, इंद्रिय दमन, मनोनिग्रह जैसे षट्‍गुणों से युक्त आदर्श चरित्र की स्थापना रामकथा का मुख्य प्रयोजन है।
शाश्वत एवं स्वयं सिद्ध नियम यह है की प्राकृतिक व्यतिक्रम से ही रोग उत्पन्न होते हैं। तथा समानुपातन से उनका निदान भी हो जाता है। जब भी नैसर्गिक संचरण में भेद पैदा होगा, कोई न कोई अनपेक्षित या कृत्रिम घटना-दुर्घटना जन्म लेगी ही।
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप।
ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप॥
भावार्थ:-जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःख रूप घर में आसक्त हैं, वे श्री रघुनाथजी को कैसे जान सकते हैं? वे मूर्ख तो अंधकार रूपी कुएँ में पड़े हुए हैं॥


ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड।
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड॥
भावार्थ:-माया की प्रचंड सेना संसार भर में छाई हुई है। कामादि (काम, क्रोध और लोभ) उसके सेनापति हैं और दम्भ, कपट और पाखंड योद्धा हैं॥


गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही॥
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥
भावार्थ:-(रज, तम आदि) गुणों का किया हुआ सन्निपात किसे नहीं हुआ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मद ने अछूता छोड़ा हो। यौवन के ज्वर ने किसे आपे से बाहर नहीं किया? ममता ने किस के यश का नाश नहीं किया?॥


राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी॥
जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं॥
भावार्थ:-भगवान्‌ श्री राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं, जन्म, कर्म और नाम भी अनंत हैं। जल की बूँदें और पृथ्वी के रजकण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्री रघुनाथजी के चरित्र वर्णन करने से नहीं चूकते॥
हर देश और धर्म में चार तरह के लोग मिल जाएंगे-

1. पहले वे जो ज्ञान, विज्ञान और धर्म में रुचि रखते हैं और सत्य आचरण करते हैं। पहले किस्म के लोग जरूरी नहीं है कि धर्म-कर्म में रुचि रखने वाले ही हों। वे साहित्य और सृजन के किसी भी क्षेत्र में रुचि रखने वाले हो सकते हैं।

ब्राह्मणत्व से तात्पर्य है जो ब्रह्म में विश्वास रखते हुए श्रेष्ठ चिन्तन व श्रेष्ठ कर्म का हो। दलित, आदिवासी आदि समाज के लोगों में ब्राह्मण मिलते हैं।


2. दूसरे वे जो राजनीति और शक्ति के कार्य में रुचि रखते हैं। दूसरे किस्म के लोग जरूरी नहीं है कि राजनीति में ही रुचि रखने वाले हों। वे अच्‍छे सैनिक, खिलाड़ी, प्रबंधक और पराकर्म दर्शाने वाले सभी कर्म में रुचि रखने वालों में भी हो सकते हैं।

3. तीसरे वे जो उद्योग-व्यापार में रुचि रखकर सभी के हित के लिए कार्य करते हैं। तीसरे किस्म के लोग व्यापारी के अलावा श्रेष्ठ किस्म के व्यवस्थापक, अर्थ के ज्ञाता, बैंक या वित्त विभाग को संभालने वाले आदि हो सकते हैं।

4. चौथे किस्म के वे लोग जो किसी भी कार्य में रुचि नहीं रखते। जो रा‍क्षसी कर्म में ही रुचि रखते हैं अर्थात जिनकी दिनचर्या में शामिल होता है खाना, पीना, संभोग करना और सो जाना।चौथे किस्म के लोग जरूरी नहीं है कि पशुवत या राक्षसी जीवन जीने वाले लोग ही हों, वे अपराधी और हर समय बुरा ही सोचने, बोलने और करने वाले लोग भी हो सकते हैं। वे मूढ़ किस्म के लोग होते हैं। ऐसे लोग पढ़े लिखे भी हो सकते हैं और अनपढ़ भी ।

शूद्र निशाचरी, राक्षसी और अप्रमादी कर्म करने वाले को कहते हैं । शूद्रत्व से अर्थ है ब्रह्म को छोड़कर अन्य में मन रमाने वाला निकृष्ट चिंतन व निकृष्ट कर्म करने वाला।

साभार : वेबदुनिया