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Wednesday, October 10, 2012

हमारे शिवपुराण में कहा गया है कि दयालु मनुष्य, अभिमानशून्य व्यक्ति, परोपकारी और जितेंद्रीय ये चार पवित्र स्तंभ हैं, जो इस पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, भ्राता एवं आदर्श राजा- एक वचन, एक पत्नी, एक बाण जैसे व्रतों का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले राम का चरित्र उकेरकर अहिंसा, दया, अध्ययन, सुस्वभाव, इंद्रिय दमन, मनोनिग्रह जैसे षट्‍गुणों से युक्त आदर्श चरित्र की स्थापना रामकथा का मुख्य प्रयोजन है।
सनातन जीवन दर्शन विशेष रूप से किसी सीधी राह की बात नहीं सोचता, वह जीवन की जटिलताओं को अच्छी तरह ध्यान में रखते हुए ही लम्बी और घुमावदार राह की परिकल्पना करता है। सनातन धर्म में गुरू की कल्पना परित्राता के रूप में नहीं है, नेत्र - उन्मीलक के रूप में है, वह राह चलना नहीं सिखाता, राह पहचानना सिखाता है, चलना तो आदमी को स्वयं होता है।
प्रभु श्री कृष्ण जी श्रीमद् भागवत में कहतें हैं की
यत्र तत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया,
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् भयाद् वापि याति तत्तत् स्वरूप ताम्।
व्यक्ति स्नेह, द्वेष एवं भय से प्रेरित होकर अपने मन को, भावना को, बुद्धि द्वारा जहां-तहां ले जाता है। मन वैसा ही आकार धारण कर लेता है। स्नेह से प्रेरित मन स्नेही, भय से भय युक्त और द्वेष से द्वेषी हो जाता है। संसार में जितने कारण बंधन के लिए हैं, उतन
े ही कारण मुक्ति के भी हैं। भावों के कारण ही राग, द्वेष, अमृत, विष आदि द्वैत कोई एक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। मन को विचारों के जिस रस से भावित किया जाए, वैसी ही भावना बन जाती है। बुद्धि तात्विक परिस्थिति के अनुरूप निश्चित निर्णय पर पहुंचती है। मन प्रत्यक्ष से प्रभावित होकर तत्काल निर्णय कर बैठता है। मन सम्मत कृत्रिम इच्छा जीव की इच्छा है। इसी मन से मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण करता है। मनमानी करता है। यहां बुद्धि सम्मत सहज इच्छा को ईश्वरीय कहा गया है। यह मानव को अतिक्रमण नहीं करने देती । इसी को बुद्धिमानी कहते हैं। अविद्या के चार दोष जहां मन को मनमानी करने के प्रवृत्त कर अतिक्रमण के कारण बनते हैं, वहीं विद्या रूपी चार गुण बुद्धि को बल प्रदान करते हुए मनोनियंत्रण के कारण बनते हैं। शब्द ब्रह्म रूपी शास्त्र ज्ञान ही ज्ञान है। इसे न जानना ही अविद्या है। आत्म विकास को ही ऎश्वर्य कहते हैं। संकोच ही अस्मिता है । विकास ही स्मित भाव है। आत्मा में सम्पूर्ण ऎश्वर्य व्याप्त है । किन्तु अस्मिता दोष के कारण व्यक्ति स्वयं को दीन-हीन-द्ररिद्र मानता रहता है । राग-द्वेष सहित ग्रन्थि बन्ध आसक्ति है। स्वरूप स्थिति को धर्म कहा है। इसको विस्मृत कराने वाली हठधर्मिता ही अभिनिवेश है । विद्या से बुद्धि सबल होकर मन का नियंत्रण रखती है। इसके बिना मन अधर्म के प्रवाह में बह जाता है।

शनि देव

'ऊँ शं शनिश्चरायै नम:'
शनिवार शनि देव का दिन माना गया है। इस दिन शनि के निमित्त विशेष पूजन, दान या धार्मिक कर्म करने से कई प्रकार के शुभ फल प्राप्त होते हैं। शनिदेव की शुभ दृष्टि प्राप्त करने के लिए किसी भी शनिवार से यह उपाय शुरू करें। इस उपाय के अनुसार आपको लगातार सात शनिवार तक बिना विलंब एक-एक नारियल किसी पवित्र नदी में प्रवाहित करना है। साथ ही नारियल प्रवाहित करते समय ऊँ रामदूताय नम: मंत्र का
जप करें।
-----लगातार सात शनिवार इस प्रकार करने से समस्याओं का प्रभाव कम हो जाएगा और हनुमानजी के साथ ही शनिदेव की कृपा भी प्राप्त होगी।इसके अलावा प्रति मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। हनुमानजी के भक्तों पर शनिदेव का कुप्रभाव नहीं होता है।
----हर शनिवार को किसी पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाने और सात बार परिक्रमा करने से भी शनि के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है।
----हर शनिवार किसी काले कुत्ते को तेल लगी हुई रोटी खिलाना चाहिए। ज्योतिष के अनुसार कुत्ते को रोटी खिलाने से शनि के दोष शांत होते हैं।
- ---शनिवार के दिन तेल का दान करें। शनि देव के दर्शन करें और शनि मंत्र का जप करें। शनि मंत्र: ऊँ शं शनैश्चराय नम:
- ---प्रतिदिन महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। मंत्र ऊँ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।
- ---प्रतिदिन किसी शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर दूध और जल अर्पित करें। साथ ही ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करें।
- ---नियमित रूप से श्रीकृष्ण की पूजा करें और इस मंत्र का जप करें। मंत्र: ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:
- ---किसी शुभ मुहूर्त में चांदी का नाग का जोड़ा बनवाएं और उसकी पूजा करके किसी पवित्र नदी में श्रद्धापूर्वक प्रवाहित करें।
-----शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल का छल्ला मध्यमा अंगुली यानी मीडिल फिंगर में पहनें। इससे भी शनि दोष शांत होता है।
----प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और बिल्व पत्र अर्पित करने चाहिए। ऐसा करने पर शनि के दोषों से मुक्ति मिलती है।
----समय-समय पर गरीब लोगों को काले कंबल का दान करना चाहिए। शनि देव गरीबों की मदद करने वाले लोगों से विशेष स्नेह रखते हैं और उन्हें कष्ट नहीं देते हैं।
जहां सभी देवी-देवताओं को हमारे धर्म शास्त्रों में वस्त्राभूषणों से सुसज्जित बताया गया है वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृगचर्म ( हिरण की खाल ) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म शिव का प्रमुख वस्त्र भी यही है क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। संतों का भी एक मात्र वस्त्र भस्म ही है। अघोरी, संन्यासी और अन्य साधु भी अपने शरीर पर भस्म रमाते हैं। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा
आध्यामित्क कारण भी हैं।
भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म, त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्म धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

देवी-देवता

हमारे 33 करोड़ देवी-देवता हैं। इतने देवी-देवता कैसे ? यह प्रश्न कई बार हम अधिकांश लोगों के मन में उठता रहता है। सामान्यत: कहा जाता है कि हिंदुओं के शास्त्रों के अनुसार देवताओं की संख्या 33 कोटि बताई गई हैं। इन्हीं 33 कोटियों की गणना 33 करोड़ देवी-देवताओं के रूप में की जाती है। इन 33 कोटियों में आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति शामिल है। इन्हीं देवताओं को 33 करोड़ देवी-देवता माना गया है।
कुछ विद्वानों ने अंतिम दो देवताओं में इंद्र और प्रजापति के स्थान पर दो अश्विनीकुमारों को भी मान्यता दी है। श्रीमद् भागवत में भी अश्विनीकुमारों को ही अंतिम दो देवता माना गया है। इस तरह हिंदू देवी-देवताओं में तैंतीस करोड़ नहीं, केवल तैंतीस ही प्रमुख देवता हैं। कोटि शब्द के दो अर्थ हैं, पहला करोड़ और दूसरा प्रकार या तरह के। इस तरह तैंतीस कोटि को जो कि मूलत: तैंतीस तरह के देव-देवता हैं, उन्हें ही तैंतीस करोड़ माना गया है।
हमारे भारतीय देवी देवता हिंदू देववाद पर वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक और लोकधर्म का प्रभाव है। वैदिक धर्म में देवताओं के मूर्त रूप की कल्पना मिलती है। वैदिक मान्यता के अनुसार देवता के रूप में मूलशक्ति सृष्टि के विविध उपादानों में संपृक्त रहती है। एक ही चेतना सभी उपादानों में है। यही चेतना या अग्नि अनेक स्फुर्लिंगों की तरह (नाना देवों के रूप में) एक ही परमात्मा की विभूतियाँ हैं। ( एकोदेव: सर्वभूतेषु गूढ़: )। वैदिक देवताओं का वर्गीकरण तीन कोटियों में किया गया है पृथ्वीस्थानीय, अंतरिक्ष स्थानीय और द्युस्थानीय। अग्नि, वायु, और सूर्य क्रमश: इन तीन कोटियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हीं त्रिदेवों के आधार पर पहले ३३ और बाद को ३३ कोटि देवताओं की परिकल्पना की गई है। ३३ देवताओं के नाम और रूप में ग्रंथभेद से बड़ा अंतर है। ‘शतपथ ब्राम्हण’ (४.५.७.२) में ३३ देवताओं की सूची अपेक्षाकृत भिन्न है जिनमें ८ वसुओं, ११ रुद्रों, १२ आदित्यों के सिवा आकाश और पृथ्वी गिनाए गए हैं। ३३ से अधिक देवताओं की कल्पना भी अति प्राचिन है। ऋग्वेद के दो मंत्रों में (३.९.९; १०. ५२. ६) ३३३९ देवताओं का उल्लेख है। इस प्रकार यद्यपि मूलरूप में वैदिक देववाद एकेश्वरवाद पर आधारित है, किंतु बाद को विशेष गुणवाचक संज्ञाओं द्वारा इनका इस रूप में विभेदीकरण हो गया कि उन्होंने धीरे धीरे स्वतंत्र चारित्रिक स्वरूप ग्रहण कर लिया। उनका स्वरूप चरित्र में शुद्ध प्राकृतिक उपादानात्मक न रहकर धीरे धीरे लोक आस्था, मान्यता और परंपरा का आधार लेकर मानवी अथवा अतिमानवी हो गया।
बजरंगबली को सिंदूर का चोला चढ़ाया जाता है। कहते हैं उन्हें सिंदूर चढ़ाने से सारे संकट और पीड़ाएं खत्म हो जाती हैं। ऐसा क्यों है? सिंदूर में ऐसा क्या है कि हनुमान को इतना प्रिय है। इसके पीछे एक कथा है और फिर इसका तार्किक व दार्शनिक पक्ष। कथा यह है कि एक बार हनुमान ने सीता को मांग में सिंदूर भरते देख लिया, जिज्ञासा हुई तो उन्होंने सीताजी से पूछ लिया कि मांग में सिंदूर क्यों लगाती हैं। सीताजी ने हनुमान को समझाया कि अपने सुहाग यानी भगवान राम की लंबी आयु के लिए। बस फिर क्या था भगवान की लंबी उम्र के लिए हनुमान ने पूरे शरीर पर सिंदूर पोत लिया। तभी से उन्हें सिंदूर का चोला चढ़ाने की परंपरा है।
बजरंगबली नाम के पीछे भी वज्र शब्द का योगदान है। संस्कृत में एक शब्द है वज्रः या वज्रम् जिसका अर्थ है बिजली, इन्द्र का शस्त्र , हीरा अथवा इस्पात। इससे ही हिन्दी का वज्र शब्द बना है। इन्द्र के पास जो वज्र था वह महर्षि दधीचि की हडि्डयों से बना
था। हनुमान वानरराज केसरी और अंजनी के पुत्र थे। केसरी को ऋषि-मुनियों ने अत्यंत बलशाली और सेवाभावी संतान होने का आशीर्वाद दिया। इसीलिए हनुमान का शरीर लोहे के समान कठोर था। इसीलिए उन्हें वज्रांग कहा जाने लगा। अत्यंत शक्तिशाली होने से वज्रांग के साथ बली शब्द जुड़कर उनका नाम हो गया वज्रांगबली जो बोलचाल की भाषा में बना बजरंगबली।
ब्रह्म पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात जिस व्यक्ति का श्राद्घ कर्म नहीं किया जाता है उन्हें पितृ लोक में स्थान नहीं मिलता है। वह भूत-प्रेत बनकर भटकते रहते हैं और कष्ट भोगते हैं। श्राद्घ पक्ष आने पर यमराज की आज्ञा से विभिन्न योनियों में पड़े पितृगण श्राद्घ की इच्छा से अपनी संतानों के घर के दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। पितृपक्ष के 15 दिनों तक जो व्यक्ति अपने पितरों को श्रद्घापूर्वक अन्न जल भेंट करते हैं तथा उनके नाम से ब्रह्मणों को भोजन कराते हैं वह पितरों के आशीर्वाद से पितृदोष से मुक्त हो जाते हैं। जो लोग पितृपक्ष में पितरों का श्राद्घ नहीं करते हैं उनकी संतान की कुण्डली में पितृदोष लगता है तथा अगले जन्म में वह भी पितृ दोष से पीड़ित होकर कष्ट प्राप्त करते हैं।

Thursday, October 4, 2012

व्यावहारिक वेदान्त

मैं भारतवर्ष, समस्त भारतवर्ष, हूँ। भारत-भूमि मेरा अपना शरीर है। कन्याकुमारी मेरा पाँव है। हिमाचल मेरा शिर है। मेरे बालों में श्री गंगा जी बहती हैं। मेरे शिर से सिन्धु और ब्रह्मपुत्र निकलते हैं। विन्ध्याचल मेरी कमर के गिर्द कमरबन्द है। कुरुमण्डल मेरी दाहिनी और मलाबार मेरी बाईं जंघा (टाँगें) है। मैं समस्त भारतवर्ष हूँ, इसकी पूर्व और पश्चिम दिशाएँ मेरी भुजाएँ हैं, और मनुष्य जाति को आलिंगन करने के लिए
मैं उन भुजाओं को सीधा फैलाता हूँ। आहा! मेरे शरीर का ऐसा ढाँचा है? यह सीधा खड़ा है और अनन्त आकाश की ओर दृष्टि दौड़ा रहा है। परन्तु मेरी वास्तविक आत्मा सारे भारतवर्ष की आत्मा है। जब मैं चलता हूँ तो अनुभव करता हूँ कि सारा भारतवर्ष चल रहा है। जब मैं बोलता हूँ तो मैं मान करता हूँ कि यह भारतवर्ष बोल रहा है। जब मैं श्वास लेता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि यह भारतवर्ष श्वास ले रहा है। मैं भारतवर्ष हूँ, मैं शंकर हूँ, मैं शिव हूँ। स्वदेशभक्ति का यह अति उच्च अनुभव है, और यही 'व्यावहारिक वेदान्त' है।
- रामतीर्थ (स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली, भाग 7, पृष्ठ 126)

Sunday, September 30, 2012

आप सभी जानते हैं की सनातन धर्म कोई नाम नहीं है , यह तो केवल यह बताता है कि धर्म सदा से था । मनुष्य का शाश्वत व सनातन धर्म जो है , उसे सनातन धर्म कहा जाता है । हम हिंदुओं को अपने धर्म का नाम रखने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई । इसका कारण है , नाम की आवश्यकता कब महसूस होती है , जब किसी दूसरे की उपस्थिति हो , जब कोई दूसरा हो ही नहीं तो नाम अनावश्यक हो जाता है । एक से अधिक लोग हों तो नाम आवश्यक हो जाता है , नहीं तो किसी को पुकारेंगे कैसे ? एक बात और ध्यान में लेना चाहिये कि नाम हमेशा दूसरे के ही द्वारा दिया जाता है , तो ऐसे ही 'हिंदू' नाम अन्य लोगों के द्वारा ही दिया गया है । जिस किसी के द्वारा हिंदू नाम दिया गया हो , लेकिन यह नाम उन लोगों को दिया गया , जो सनातन धर्म का पालन कर रहे थे । आज विश्व में जो भी हिंदू नाम से जाने जाते हैं, वो वही सनातन धर्मीय हैं ।
हमारा सनातन धर्म सिर्फ आपको सत्य ही नहीं बताता है बल्कि सत्य का साक्षात्कार कैसे किया जाए यह भी बताता है । इस धर्म में ऐसी विधियाँ हैं जो आधुनिक मनुष्य के तनावग्रस्त मन को शांति प्रदान करती हैं । योग और तंत्र में सैकड़ों विधियाँ हैं जो किसी भी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायक हैं । हिंदुत्व का पूरा जोर ही आत्मज्ञान पर है । हिंदुत्व की मान्यता है, जो सच भी है कि हर मनुष्य जन्मतः आत्मज्ञानी है ही, बस वो इस बात को भूल गया है । इसीलिए अध्यात्म का सारा जोर इसी पर है कि व्यक्ति अपनी मूर्छा से जगे और जान ले कि वह शुद्ध और बुद्ध है । हिंदुत्व अपने पराये का भेदभाव नहीं करता है, वह तो सारे विश्व को ही एक परिवार समझता है । कोई इस धर्म को नहीं भी मानता है तो उसके प्रति किसी भी तरह का क्लेश नहीं रखता है ।
आज समय की मांग है की हर मानव तक सर्व श्रेष्ठ सनातन धर्म का दर्शन पहुँचाने की आवश्यकता है । अन्य लोगों को भी सत्पथ पर लाना धर्म का ही अंग है । हमें दोतरफा काम करना होगा । एक तरफ हमें सत्य के नाम पर जो असत्य का प्रचार हो रहा है उसकी असलियत लोगों तक पहुंचानी होगी । दूसरी तरफ लोगों को सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करना होगा । यह सही है कि हिंदुत्व को समझना हर किसी के लिए संभव नहीं है , लेकिन हमारा कर्तव्य है कि जो लोग भटके हुए हैं उन तक सही मार्ग की जानकारी पहुंचाएं । जिस दिन सारा विश्व हिंदुत्व को समझने लगेगा, मानने लगेगा , उसी दिन ऋषियों का स्वप्न -"कुर्वन्तु विश्वम आर्यम " पूर्ण होगा । और यह होगा , इसे कोई रोक नहीं सकता है।
संस्कृत के जानकार , मैक्समूलर, जिन्होंने शायद सबसे पहले वेदों का परिचय यूरोप को करवाया । एक बार मैक्समूलर हिंदुत्व के ऊपर यूरोप में कहीं व्याख्यान दे रहे थे । अब हिंदू दर्शन तो है ही उच्चतम स्तर का.तो एक बिशप ने उनसे प्रश्न किया कि जब हिंदू दर्शन इतना उच्च कोटि का है तो हिंदू अन्य देशों में इसका प्रचार क्यों नहीं करते ? मैक्समूलर का उत्तर अद्भुत था पाश्चात्य लोगों के लिए । उन्होंने कहा कि हिंदू धर
्म को अपनी माँ समझते हैं और माँ का प्रचार करना उन्हें सही नहीं लगता है । हम देखते हैं कि अब्राहमिक पंथों के दर्शन हिंदू दर्शन के सामने ज्यादा महत्त्व के नहीं हैं लेकिन उनका प्रचार प्रसार ज्यादा हुआ है । हमारे ही देश में अब सनातन धर्म का ह्रास होने लगा है क्योंकि हमारे मस्तिष्क में पाश्चात्य परिवेश का पूर्ण प्रभाव है ।
संत कबीर का आध्यात्मिक अनुभव रहस्यानुभूतियों के विषय में कहना है-
हीरो पायो,गांठ गठियायो,बार-बार वाकोक्यूंखोले।
आशय यह कि आध्यात्मिक अनुभव इतने विचित्र, इतने एकांतिक, इतने दुरूह होते हैं और इतने बहुमूल्य भी कि उन्हें व्यक्त करने के प्रयास में उनके बिखर जाने का अथवा विलुप्त हो जाने का भय बना रहता है। अत:साधक और सिद्ध इन अनुभवों को गोपनीय ही रखते हैं।

पितृपक्ष में अपने पितरो का तर्पण

आयुः पुत्रान्‌ यशः स्वर्ग कीर्ति पुष्टि बलं यिम्‌। 

पशून्‌ सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात्‌ पितृपूजनात्‌।

सनातन धर्म की मान्यता है कि आश्विन मास के कृष्णपक्ष में यमराज सभी पितरों को अपने यहां से छोड़ देते हैं, ताकि वे अपनी संतान से श्राद्ध के निमित्त भोजन कर सकें ।  इस माह में श्राद्ध न करने वालों के अतृप्त पितर उन्हें श्राप देकर पितृलोक चले जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों को भारी कष्ट उठाना पड़ता है ।
 गरुड़ पुराण में कहा गया है कि आयु: पुत्रान यश: स्वर्ग कीर्ति पु‌ष्टि बलं श्रियम्, पशून सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृजूननात अर्थात श्राद्ध कर्म करने से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, मोक्ष, स्वर्ग कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशुधन, सुख, धन व धान्य वृद्धि का आशीष प्रदान करते हैं ।
यमस्मृति में लिखा है कि पिता, दादा, परदादा तीनों श्राद्ध की ऐसे आशा रखते हैं । जैसे वृक्ष पर रहते हुए पक्षी वृक्षों में लगने वाले फलों की. ब्राह्मण को पृथ्वी का भूदेव कहा गया है । उसकी जठराग्नि कव्य को पितरों तक पहुंचाने का कार्य करती है । पितृ जिस योनि में हों उसी रूप में अन्न उन्हें मिल जाता है । इसलिए ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा देकर संतुष्ट करने का भी विधान है ।
हम आज इस सुन्दर दुनिया में जिस माता, पिता, दादा, दादी, प्रपितामह, मातामही एवं अन्य बुजुर्गो के लाड, प्यार, श्रम से कमाए धन एवं इज्ज़त के सहारे  सुख पूर्वक विचरण कर रहे है । आज जब उनका पांच भौतिक शरीर पांच तत्त्व में विलीन हो गया है तो हमारा यह परम कर्त्तव्य बनता है कि अपने पितरो के उन पांचो तत्वों के संतुलित समन्वय के लिए निर्दिष्ट एवं अपेक्षित भूमिका निभाएं तथा कम से कम और कुछ नहीं कर सकते तो तर्पण तो कर दें ।
इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वाले को जिस प्रकार इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्म से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति का अनुभव करता है। उसकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केन्द्र बिन्दु श्रद्धा है। श्रद्धा भरे वातावरण के सान्निध्य में पितर अपनी अशान्ति खोकर आनन्द का अनुभव करते हैं, श्रद्धा ही इनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रद्धा एवं तर्पण किये जाते हैं। इन क्रियाओं का विधि-विधान इतना सरल एवं इतने कम खर्च का है कि निधर्न से निधर्न व्यक्ति भी उसे आसानी से सम्पन्न कर सकता है। तर्पण में प्रधानतया जल का ही प्रयोग होता है। उसे थोड़ा सुगंधित एवं परिपुष्ट बनाने के लिए जौ, तिल, चावल, दूध, फूल जैसी दो-चार मांगलिक वस्तुएँ डाली जाती हैं। कुशाओं के सहारे जौ की छोटी-सी अंजलि मन्त्रोच्चारपूवर्क डालने मात्र से पितर तृप्त हो जाते हैं, किन्तु इस क्रिया के साथ आवश्यक श्रद्धा, कृतज्ञता, सद्भावना, प्रेम, शुभकामना का समन्वय अवश्य होना चाहिए।
पितृ-कर्मो के करने वाले यह ध्यान रखें कि इन छोटे-छोटे क्रिया-कृत्यों को करने के साथ-साथ दिवंगत आत्माओं के उपकारों का स्मरण करें, उनके सद्गुणों तथा सत्कर्मो के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें। कृतज्ञता तथा सम्मान की भावना उनके प्रति रखें और यह अनुभव करें कि यह जलांजलि जैसे अकिंचन उपकरणों के साथ, अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हुए स्वगीर्य आत्माओं के चरणों पर अपनी सद्भावना के पुष्प चढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार की भावनाएँ जितनी ही प्रबल होंगी, पितरों को उतनी ही अधिक तृप्ति मिलेगी। जिस पितर का स्वगर्वास हुआ है, उसके किये हुए उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, उसके अधूरे छोड़े हुए पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने में तत्पर होना तथा अपने व्यक्तित्व एवं वातावरण को मंगलमय ढाँचे में ढालना मरणोत्तर संस्कार का प्रधान प्रयोजन है।
धर्मशास्त्रोक्त सभी ग्रंथों के अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक मधु, डेढ़ प्रहर तक दुग्ध, साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप से पितृ को प्राप्त होता है। श्राद्ध में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर पितृ तीर्थ यानी अंगूठे की ओर से धरती में छोड़ने से पितर को तृप्ति मिलती है। महर्षि पुलस्त्य के अनुसार जिस कर्मविशेष में दूध, घृत और मधु से युक्त अच्छी प्रकार से पके हुए पकवान श्रद्धापूर्वक पितृ के उद्देश्य से गौ, ब्राह्मण आदि को दिए जाते हैं वही श्राद्ध है। अतः जो लोग विधिपूर्वक शांत मन होकर श्राद्ध करते हैं वह सभी पापों से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। उनका संसार में चक्र छूट जाता है।
राद्धपक्ष में पितर देवता की तरह पूजे जाते हैं और देवता भी जिस तरह भक्त की भावना से प्रसन्न होते हैं, ठीक उसी तरह से पूर्वज अपने वंशजों की भावनाओं से खुश होकर खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं।
यथासंभव तर्पण का काम किसी ज्ञानी व विद्वान ब्राह्मण से कराया जाना श्रेष्ठ होता है। किंतु श्राद्ध करने वाले को भी तर्पण के वक्त कुछ बातों का ख्याल रख तर्पण करना चाहिए -
- तर्पण जल में खड़े होकर ही करना चाहिए। इसके विपरीत करने से निरर्थक माना जाता है।
- साधारण या नित्य तर्पण दोनों हाथों से करना चाहिए, किंतु श्राद्ध में तर्पण केवल दाहिने हाथ से करना चाहिए।
- श्राद्ध मे तिल-तर्पण का महत्व है। तिल से तर्पण खुले हाथ से करना चाहिए। तिलों को रोओं में या हाथ में लगे नहीं रहना चाहिए।
- स्नान-तर्पण, ग्रहण, महालय यानी श्राद्धपक्ष, तीर्थ-विशेष में तो तिल से तर्पण का कोई निषेध नहीं है, लेकिन तर्पण के लिए शुक्रवार, रविवार, संक्रांति में तिल का तर्पण निषेध है।
जो व्यक्ति पितृपक्ष के पंद्रह दिनों तक श्राद्ध तर्पण आदि नहीं कहते हैं वे अमावस्या को ही अपने पितृ के निमित्त श्राद्धादि संपन्न करते हैं। जिन पितृ की तिथि याद नहीं हो, उनके निमित्त श्राद्ध तर्पण, दान आदि इसी अमावस्या को किया जाता है। 


Saturday, September 29, 2012

सनातन जीवन दर्शन विशेष रूप से किसी सीधी राह की बात नहीं सोचता, वह जीवन की जटिलताओं को अच्छी तरह ध्यान में रखते हुए ही लम्बी और घुमावदार राह की परिकल्पना करता है। सनातन धर्म में गुरू की कल्पना परित्राता के रूप में नहीं है, नेत्र - उन्मीलक के रूप में है, वह राह चलना नहीं सिखाता, राह पहचानना सिखाता है, चलना तो आदमी को स्वयं होता है।
हम सनातनी लोग पेड़ में, पौधे में, नदी में, पत्थर में, हवा में, बादल में, प्राणवत्ता देखते हैं और अपने काव्य, अपनी कला और अपने शिल्प में समस्त प्राणवान् वस्तुओं में एक लयबध्द स्पन्दन देखने की कोशिश करते हैं, और भूमिकाओं के विनिमय की बात सोचते हैं तो पत्थर की मूर्ति में प्राण आ जाता है और प्राणवान् आदमी पत्थर हो जाता है, प्रकृति सहचरी बनती है और सहचरी प्रकृति में छा जाती है।
हमारे सनातन धर्म में चार ऋणों की परिकल्पना है :-
१. ऋषि ऋण
२. पितृ ऋण
३. देव ऋण
४. भूत ऋण
ऋषि ऋण ब्रहमचर्य आश्रम और ब्राहमण के धर्म - स्वाध्याय से उतरता है।
पितृ ऋण गृहस्थ आश्रम और क्षत्रिय के सर्वपालक कार्य से उतरता है।
देवऋण बानप्रस्थ आश्रम और विनियम - प्रधान वैश्य के कार्य से उतरता है। देवता की उपासना में एक - दूसरे को उपकृत करने की भावना रहती है। यज्ञ और उपासना के द्वारा मनुष्य देवता को भावित

करता है उसी के द्वारा देवता भी मनुष्य को भावित करते हैं।
चौथे वर्ण, चौथे आश्रम और चौथे ऋण की परिकल्पना एक उत्तरवर्ती विकास है। तीन को अतिक्रमण करने वाले वर्ण, आश्रम और ऋण की अवधारणा वैदिक यज्ञ - संस्था के पूर्ण विकास के अनन्तर हुई। वर्णों में शूद्र को स्थान, आश्रमों में संन्यास को स्थान और ऋणों में भूतऋण या मनुष्य ऋण को स्थान देना एक सर्वग्राही व्यापक और आध्यात्मिक चिन्तन के उत्कर्ष के परिणामस्वरूप हुआ। भूतऋण या मनुष्य ऋण केवल अपने पिता का ऋण नही, केवल अपने देवता का ऋण नहीं, केवल अपनी ज्ञान - परम्परा का ऋण नहीं, बल्कि समस्त मनुष्य जाति और समस्त प्राणियों का ऋण है। उससे निस्तार पाने के लिए आदमी को निर्वर्ण हो जाना पड़ता है तथा उसे अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विलय कर देना पड़ता है- वह एक प्रकार से शूद्र हो जाता है और उसका जीवन केवल दूसरों के लिए ही शेष रह जाता है तभी वह परब्रहम के साथ जुड़ जाता है। इस प्रकार सनातन धर्म में सारा जीवन ऋणों से निस्तार पाने का प्रयत्न है और इसका अन्तिम भाव सेवाधर्म के द्वारा मनुष्य ऋण से विस्तार के लिए सुरक्षित है।
सनातन धर्मी जीवन-दर्शन कर्म का त्रिविध विभाजन करता है-प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण। प्रारब्ध का भोग करना पड़ता है, संचित और क्रियमाण का भोग नियत रूप में नहीं करना पड़ता। आदमी चाहे तो अपने कठोर संकल्प के द्वारा ऐसा अभ्यास कर सकता है कि संचित और क्रियमाण कर्म ही प्रारब्ध का भोग कराते हुए भी जीवन क्रम को संचित की अपेक्षा से मुक्त कर लेता है और इसलिए वह पूर्वनियत फल की धारा को मोड़ भी देता है। इस अर्थ
में वह प्रारब्ध से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। क्रियमाण कर्म यदि ठीक तरह अनुवर्तित किया गया तो वह न केवल प्रारब्ध को भोगने के लिए भीतर से शक्ति और विश्वास देता है, बल्कि प्रारब्ध के भोग की अवधि को भी इस माने में कम कर सकता है कि कालावधि का अनुभव ही कम योग पूर्वक क्रियमाण कर्म के द्वारा संकुचित या विस्तृत किया जा सकता है। हिन्दू जीवन- दर्शन काल की किसी निरपेक्ष इकाई को नहीं स्वीकार करता। प्रत्येक व्यक्ति का स्वकर्म और स्वधर्म उसकी अपनी निजी क्षमता और परिस्थिति से निरूपित होता है। उसी कर्म को वह जब इस प्रकार करता है कि अपने लिए नहीं, बल्कि सर्वात्मा के लिए है तो वह सिध्दि प्राप्त कर लेता है। कोई भी कर्म अपने आप में छोटा-बड़ा नहीं, उसके अनुष्ठान का संकल्प और उस अनुष्ठान के पीछे निहित भावना से ही वह छोटा या बड़ा होता है।
प्रभु श्री कृष्ण जी श्रीमद् भागवत में कहतें हैं की
यत्र तत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया,
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् भयाद् वापि याति तत्तत् स्वरूप ताम्।
व्यक्ति स्नेह, द्वेष एवं भय से प्रेरित होकर अपने मन को, भावना को, बुद्धि द्वारा जहां-तहां ले जाता है। मन वैसा ही आकार धारण कर लेता है। स्नेह से प्रेरित मन स्नेही, भय से भय युक्त और द्वेष से द्वेषी हो जाता है। संसार में जितने कारण बंधन के लिए हैं, उतन

े ही कारण मुक्ति के भी हैं। भावों के कारण ही राग, द्वेष, अमृत, विष आदि द्वैत कोई एक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। मन को विचारों के जिस रस से भावित किया जाए, वैसी ही भावना बन जाती है। बुद्धि तात्विक परिस्थिति के अनुरूप निश्चित निर्णय पर पहुंचती है। मन प्रत्यक्ष से प्रभावित होकर तत्काल निर्णय कर बैठता है। मन सम्मत कृत्रिम इच्छा जीव की इच्छा है। इसी मन से मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण करता है। मनमानी करता है। यहां बुद्धि सम्मत सहज इच्छा को ईश्वरीय कहा गया है। यह मानव को अतिक्रमण नहीं करने देती । इसी को बुद्धिमानी कहते हैं। अविद्या के चार दोष जहां मन को मनमानी करने के प्रवृत्त कर अतिक्रमण के कारण बनते हैं, वहीं विद्या रूपी चार गुण बुद्धि को बल प्रदान करते हुए मनोनियंत्रण के कारण बनते हैं। शब्द ब्रह्म रूपी शास्त्र ज्ञान ही ज्ञान है। इसे न जानना ही अविद्या है। आत्म विकास को ही ऎश्वर्य कहते हैं। संकोच ही अस्मिता है । विकास ही स्मित भाव है। आत्मा में सम्पूर्ण ऎश्वर्य व्याप्त है । किन्तु अस्मिता दोष के कारण व्यक्ति स्वयं को दीन-हीन-द्ररिद्र मानता रहता है । राग-द्वेष सहित ग्रन्थि बन्ध आसक्ति है। स्वरूप स्थिति को धर्म कहा है। इसको विस्मृत कराने वाली हठधर्मिता ही अभिनिवेश है । विद्या से बुद्धि सबल होकर मन का नियंत्रण रखती है। इसके बिना मन अधर्म के प्रवाह में बह जाता है।