Saturday, September 29, 2012

सनातन धर्मी जीवन-दर्शन कर्म का त्रिविध विभाजन करता है-प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण। प्रारब्ध का भोग करना पड़ता है, संचित और क्रियमाण का भोग नियत रूप में नहीं करना पड़ता। आदमी चाहे तो अपने कठोर संकल्प के द्वारा ऐसा अभ्यास कर सकता है कि संचित और क्रियमाण कर्म ही प्रारब्ध का भोग कराते हुए भी जीवन क्रम को संचित की अपेक्षा से मुक्त कर लेता है और इसलिए वह पूर्वनियत फल की धारा को मोड़ भी देता है। इस अर्थ
में वह प्रारब्ध से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। क्रियमाण कर्म यदि ठीक तरह अनुवर्तित किया गया तो वह न केवल प्रारब्ध को भोगने के लिए भीतर से शक्ति और विश्वास देता है, बल्कि प्रारब्ध के भोग की अवधि को भी इस माने में कम कर सकता है कि कालावधि का अनुभव ही कम योग पूर्वक क्रियमाण कर्म के द्वारा संकुचित या विस्तृत किया जा सकता है। हिन्दू जीवन- दर्शन काल की किसी निरपेक्ष इकाई को नहीं स्वीकार करता। प्रत्येक व्यक्ति का स्वकर्म और स्वधर्म उसकी अपनी निजी क्षमता और परिस्थिति से निरूपित होता है। उसी कर्म को वह जब इस प्रकार करता है कि अपने लिए नहीं, बल्कि सर्वात्मा के लिए है तो वह सिध्दि प्राप्त कर लेता है। कोई भी कर्म अपने आप में छोटा-बड़ा नहीं, उसके अनुष्ठान का संकल्प और उस अनुष्ठान के पीछे निहित भावना से ही वह छोटा या बड़ा होता है।
प्रभु श्री कृष्ण जी श्रीमद् भागवत में कहतें हैं की
यत्र तत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया,
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् भयाद् वापि याति तत्तत् स्वरूप ताम्।
व्यक्ति स्नेह, द्वेष एवं भय से प्रेरित होकर अपने मन को, भावना को, बुद्धि द्वारा जहां-तहां ले जाता है। मन वैसा ही आकार धारण कर लेता है। स्नेह से प्रेरित मन स्नेही, भय से भय युक्त और द्वेष से द्वेषी हो जाता है। संसार में जितने कारण बंधन के लिए हैं, उतन

े ही कारण मुक्ति के भी हैं। भावों के कारण ही राग, द्वेष, अमृत, विष आदि द्वैत कोई एक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। मन को विचारों के जिस रस से भावित किया जाए, वैसी ही भावना बन जाती है। बुद्धि तात्विक परिस्थिति के अनुरूप निश्चित निर्णय पर पहुंचती है। मन प्रत्यक्ष से प्रभावित होकर तत्काल निर्णय कर बैठता है। मन सम्मत कृत्रिम इच्छा जीव की इच्छा है। इसी मन से मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण करता है। मनमानी करता है। यहां बुद्धि सम्मत सहज इच्छा को ईश्वरीय कहा गया है। यह मानव को अतिक्रमण नहीं करने देती । इसी को बुद्धिमानी कहते हैं। अविद्या के चार दोष जहां मन को मनमानी करने के प्रवृत्त कर अतिक्रमण के कारण बनते हैं, वहीं विद्या रूपी चार गुण बुद्धि को बल प्रदान करते हुए मनोनियंत्रण के कारण बनते हैं। शब्द ब्रह्म रूपी शास्त्र ज्ञान ही ज्ञान है। इसे न जानना ही अविद्या है। आत्म विकास को ही ऎश्वर्य कहते हैं। संकोच ही अस्मिता है । विकास ही स्मित भाव है। आत्मा में सम्पूर्ण ऎश्वर्य व्याप्त है । किन्तु अस्मिता दोष के कारण व्यक्ति स्वयं को दीन-हीन-द्ररिद्र मानता रहता है । राग-द्वेष सहित ग्रन्थि बन्ध आसक्ति है। स्वरूप स्थिति को धर्म कहा है। इसको विस्मृत कराने वाली हठधर्मिता ही अभिनिवेश है । विद्या से बुद्धि सबल होकर मन का नियंत्रण रखती है। इसके बिना मन अधर्म के प्रवाह में बह जाता है।
प्रभु श्री कृष्ण जी श्रीमद् भागवत में कहतें हैं की
यत्र तत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया,
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद् भयाद् वापि याति तत्तत् स्वरूप ताम्।
व्यक्ति स्नेह, द्वेष एवं भय से प्रेरित होकर अपने मन को, भावना को, बुद्धि द्वारा जहां-तहां ले जाता है। मन वैसा ही आकार धारण कर लेता है। स्नेह से प्रेरित मन स्नेही, भय से भय युक्त और द्वेष से द्वेषी हो जाता है। संसार में जितने कारण बंधन के लिए हैं, उतन

े ही कारण मुक्ति के भी हैं। भावों के कारण ही राग, द्वेष, अमृत, विष आदि द्वैत कोई एक स्वरूप ग्रहण कर लेते हैं। मन को विचारों के जिस रस से भावित किया जाए, वैसी ही भावना बन जाती है। बुद्धि तात्विक परिस्थिति के अनुरूप निश्चित निर्णय पर पहुंचती है। मन प्रत्यक्ष से प्रभावित होकर तत्काल निर्णय कर बैठता है। मन सम्मत कृत्रिम इच्छा जीव की इच्छा है। इसी मन से मानव मर्यादाओं का अतिक्रमण करता है। मनमानी करता है। यहां बुद्धि सम्मत सहज इच्छा को ईश्वरीय कहा गया है। यह मानव को अतिक्रमण नहीं करने देती । इसी को बुद्धिमानी कहते हैं। अविद्या के चार दोष जहां मन को मनमानी करने के प्रवृत्त कर अतिक्रमण के कारण बनते हैं, वहीं विद्या रूपी चार गुण बुद्धि को बल प्रदान करते हुए मनोनियंत्रण के कारण बनते हैं। शब्द ब्रह्म रूपी शास्त्र ज्ञान ही ज्ञान है। इसे न जानना ही अविद्या है। आत्म विकास को ही ऎश्वर्य कहते हैं। संकोच ही अस्मिता है । विकास ही स्मित भाव है। आत्मा में सम्पूर्ण ऎश्वर्य व्याप्त है । किन्तु अस्मिता दोष के कारण व्यक्ति स्वयं को दीन-हीन-द्ररिद्र मानता रहता है । राग-द्वेष सहित ग्रन्थि बन्ध आसक्ति है। स्वरूप स्थिति को धर्म कहा है। इसको विस्मृत कराने वाली हठधर्मिता ही अभिनिवेश है । विद्या से बुद्धि सबल होकर मन का नियंत्रण रखती है। इसके बिना मन अधर्म के प्रवाह में बह जाता है।
इस जग में साधु कौन है? वह मनुष्य, जिसके साथ रहने से तुम्हारी नैतिकता, तुम्हारे पुण्यों का मान बढ़ता है और जो तुम्हें आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ाता है, वह तुम्हारे लिए साधु है। इसलिए तुम्हें अच्छे लोगों के संसर्ग में रहकर 24 घंटों पुण्य कर्म करना चाहिए। अच्छे कर्म तभी संभव हैं, जब तुम समाज की नि:स्वार्थ सेवा और अनवरत मानसाध्यात्मिक सेवा करते चलोगे। तभी पुण्य कर्म संभव है।
हमारे प्राचीन भारतीय आर्यों या हिंदुओं के जीवन की चार आश्रम में से अंतिम आश्रम सन्यास (सांसारिक प्रपंचों के त्याग की वृत्ति , दुनिया के जंजाल से अलग होने की अवस्था या वैराग्य ) है । जो पुत्र आदि के सयाने हो जाने पर ग्रहण की जाती थी । इसमें मनुष्य गृहस्थी छोड़कर जंगल या एकांत स्थान में ब्रह्मचिंतन या परलोकसाधन में प्रवृत्त रहते थे और भिक्षा द्वारा निर्वाह करते थे । इसमें किसी आचार्य से दीक्षा लेकर
सिर मुँड़ाते और दंड ग्रहण करते थे । संन्यास दो प्रकार का कहा गया है—एक सक्रम अर्थात् जो ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य और वानप्रस्थ आश्रम के उपरांत ग्रहण किया जाय; दूसरा अक्रम जो बीच में ही वैराग्य उत्पन्न होनेपर धारण किया जाय । बहुत दिनों तक 'संन्यास' कलिवर्ज्य माना जाता था; पर शंकराचार्य ने बौद्ध भिक्षुओं ओर जैन यतियों को अपने अपने धर्म का प्रचार बढ़ाते देख कलिकाल में फिर संन्यास चलाया और गिरि, पुरी, भारती आदि दस प्रकार के संन्यासियों की प्रतिष्ठा की जो दशनामी कहे जाते हैं ।
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ ।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ।
दूसरे लोगों से लडने में अथवा उनसे मित्रता करने में अपनी शक्ति का अपव्यय न करो। अपने बन्धु-बान्धवों से राग-द्वेष मत रखो। सर्वत्र अपने ही स्वरूप को देखो, भेद बुद्धि का त्याग करो और अज्ञान से छुटकारा पाओ।
प्रातः स्मरणीय श्री गोस्वामी तुलसी दास जी ने श्री राम चरित मानस में लिखा है :-
* कर्म प्रधान विश्व करि राखा , जो जस करा सो तस फल चाखा *
हमें अपने कर्तव्य को समझना होगा। हमें अपने दायित्व को समझना होगा। परिवार , समाज और अपने राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को निभाना होगा। दुनिया में करने को इतना कुछ है। समाज में व्याप्त ग़रीबी , भुखमरी , बीमारी , भ्रष्टाचार , बेईमानी , चोरी , लूटमार , हिंसा , व्याभिचार के खिलाफ संघर्ष करने का क्या हमारा कर्तव्य नहीं बनता है। मानव मात्र का दुख दूर करना भगवान की सबसे बड़ी सेवा है। भगवान भी अपेक्षा रखते हैं कि जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होनें सृष्टि का निर्माण किया , जिस उदेश्य की पूर्ति के लिए हमें इस धरती पर भेजा , हम उसका निर्वाह करें।
इच्छाशक्तिके कारण 'कुछ करना चाहिए' ऐसी इच्छा उत्पन्न होती है । क्रियाशक्तिके कारण प्रत्यक्ष कृत्य करनेकी प्रेरणा मिलती है ।
यदि मानव द्वारा धर्म के मर्म को जाना एवं समझा जाये तो वह निश्चित रूप से उदार ह्रदय का स्वामी होता है। धर्म एक अनुपम अमृत कुण्ड है। जिसमें एक ही बार पूरे मन से डुबकी लगाने से सारी संकीर्णताएं एवं मलीनताएं सदा-सदा के लिये धुल जाती हैं। दुनिया भर में आज जितनी भी साधनाएं प्रचलित हैं उनका एक और सिर्फ एक मात्र उद्देश्य इंसान को धार्मिक बनाना है। किन्तु धार्मिक होने का वह अर्थ बिल्कुल भी नहीं है जो आजकल
प्रचलित है। धर्म की जो परिभाषा दी जाती है,वह उचित नहीं है । इससे तो धर्म सीमित ही हुआ है। वास्तविकता यह है कि धर्म एक और सिर्फ एक ही होता है। कई सारे धर्म या अलग-अलग धर्म हो ही नहीं सकते। जिस तरह समय एक है, रोशनी एक है ,प्रेम एक है वैसे ही धर्म भी एक ही है। अलग प्रतीक, अलग रिवाज, अलग मान्यताएं तो धर्म भी अलग-अलग होगा ऐसा सोचना यही सिद्ध करता है कि मनुष्य जाति अभी अपने बचपन की अवस्था में है। पहली बात तो यह कि धर्म कभी बनाया नहीं जाता वह तो धरती पर इंसानों के जन्म से पूर्व से ही है और सदैव रहेगा। धर्म के नाम पर जिन नियम कायदों को इंसानों ने बनाया है उससे तो धर्म की हानी ही हुई है। इतिहास इस बात का गवाह है कि धर्म के नाम पर ही सबसे ज्यादा युद्ध, हिंसा, और पाप-अत्याचार हुए हैं। जिस धर्म की नींव दुनियां में प्रेम और भाईचारा बढ़ाने के लिये हुई थी उसके नाम पर दुनिया में क्या-क्या खैल खेले जा रहे है यह किसी से छुपा नहीं है। अत: जो भी अपने को धार्मिक कहने की हिम्मत रखता हो उसे यह जरूर सोचना चाहिये कि क्या वो उसका हकदार भी है।
हमारी भारतीय संस्कृति लघुता से प्रभुता पाने की संस्कृति है। अड़ना और अकड़ना ही जड़ से उखड़ने के कारण हैं। अहंकार एक ऐसा विष वृक्ष है जो बिना बोए ही उग कर आता है और जीवन में रहने वाले सारे के सारे सद्‍गुणों को बर्बाद कर देता है।
* हमारा जीवन तभी बदल जाता है जब हम बदलते हैं। न हो तो करके देखें।
* हमारा मन व मस्तिष्क सबसे बड़ी संपत्ति है, इसे हम मान लेंगे तो खुश रहेंगे ।
* किसी की भी आत्मछवि जो उसने खुद बनाई होती है उसके खुश रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। हम अपनी छवि ऐसी बनाएं जो हमको हताश-निराश न करके खुशियां दे।
* हम सम्मान करना व क्ष

मा करना सीखें व खुश रहें।
* हम जैसा सोचेंगे वैसे ही बनेंगे । अगर गरीबी के बारे में सोचेंगे तो गरीब रहेंगे और अमीरी के बारे में सोचेंगे और प्रयास करेंगें तो अमीर रहेंगे।
* इस जीवन में असफलता आती और जाती है यह सोचें और खुश रहने की कोशिश करें।
* जितने भी आशीर्वाद हमको मिले हैं आज तक, उनकी गिनती करें, उन्हें याद करके खुश रहें।
* यदि हम पूरे जीवन की खुशी चाहते हैं चाहते हैं तो कर्म से प्यार करना सीखें।
हमें मनुष्यता की प्राप्ति धन , मकान‌ , आभुषण‌ और विद्या से नही होती है ! इसकी प्राप्ति तो आत्मा की स्वच्छ्ता , शुद्धता और ह्रदय की उदारता से होती है ! कार्य भी मनुष्य कुत्सित‌ भावनाओ को रखकर , दुसरे के ऐश्वर्य‌ को लूटकर और किसी की आत्मा को सता कर मानवता को परे धकेल दिया है ! आज ज्यो ज्यो हमारा समाज और राष्ट्र उन्नति के शिखर पर चढ़ता जा रहा है , त्यों त्यों हम मनुष्यता से अपने से दूर करते जा रहे है ! इसकी दूरी से आपस मे वैमनस्यता के अंकुर फूट कर विशाल विष वृक्ष खड़े हो चुके है !